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ग़ज़ल
कोयल कव्वा चील कबूतर तोता मैना चिड़िया मोर
शाम ढले सब चुप चुप बैठे इक दूजे को तकते हैं
दानिश अज़ीज़
ग़ज़ल
तिरी बातें तिरे क़िस्से वो गुल मैना हसीं यादें
किसे मा'लूम था आख़िर उन्हें अंजान होना था
हुज़ैफ़ा अशरफ़ आसमी
ग़ज़ल
जाने कौनसा मौसम है ये चारों तरफ़ हरियाली है
तोते से मैना कहती है इमली कितनी मीठी है
जावेद अकरम फ़ारूक़ी
ग़ज़ल
ज़बाँ रखते हैं मैना की मगर तोते का क़िस्सा है
ज़रा सी बात में आँखें बदल लेने का क़िस्सा है