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ग़ज़ल
जश्न-ए-ख़ूँ-नाब है मक़्तल में मुग़न्नी से कहो
कोई इक राग नया गीत हो मल्हार के साथ
उम्मीद ख़्वाजा
ग़ज़ल
कब तक वो मल्हार की तानें क़ैद में रक्खें देखूँ तो
अब तो दीपक राग अलापूँ और ख़ुद को जल जाने दूँ
विश्वनाथ दर्द
ग़ज़ल
जो बरखा-रुत ने इसी तरह से बहा दिया सारी बस्तियों को
तो प्यासी धरती पे मेघ-मल्हार गाने वाला कोई न होगा
जब्बार वासिफ़
ग़ज़ल
उस की पायल की छन-छन पर रक़्स परिंदे करते हैं
बरखा-रुत के मौसम में वो गूँज किसी मल्हार की है
इमरान आवान
ग़ज़ल
कहीं सावन में बादल झूम कर आया नहीं अब तक
किसी ने गीत भी मल्हार का गाया नहीं अब तक