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ग़ज़ल
ज़हीन इतनी है उस से बहस तो हम कर नहीं सकते
मुझे मंटो के अफ़्साने बिला-नाग़ा सुनाती है
अज़ीम कामिल
ग़ज़ल
तिरी मक़बूलियत की वज्ह वाहिद तेरी रमज़िय्यत
कि उस को मानते ही कब हैं जिस को जान लेते हैं
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
मैं ये मानता हूँ मिरे दिए तिरी आँधियों ने बुझा दिए
मगर एक जुगनू हवाओं में अभी रौशनी का इमाम है
बशीर बद्र
ग़ज़ल
वो रूठी रूठी ये कह रही थी क़रीब आओ मुझे मनाओ
हो मर्द तो आगे बढ़ के मुझ को गले लगाओ मुझे मनाओ