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ग़ज़ल
बुत बने का'बा बना मस्जिद बनी मंदर बने
इश्क़ की दुनिया में क्या क्या दिलरुबा मंज़र बने
ख़ुशी मोहम्मद नाज़िर
ग़ज़ल
इत्तिफ़ाक़न घंटियाँ सी कान में बजने लगीं
मैं अकेला ही था घर में सारा घर मंदर लगा