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ग़ज़ल
'अदू को छोड़ दो फिर जान भी माँगो तो हाज़िर है
तुम ऐसा कर नहीं सकते तो ऐसा हो नहीं सकता
मुज़्तर ख़ैराबादी
ग़ज़ल
किसी को कोसते क्यूँ हो दुआ अपने लिए माँगो
तुम्हारा फ़ाएदा क्या है जो दुश्मन का ज़रर होगा
आग़ा अकबराबादी
ग़ज़ल
ज़माना ग़र्क़-ए-बहर-ए-ग़म जो होता है तो होने दो
तुम अपनी ख़ैर माँगो 'नूह' तुम को सब से क्या मतलब