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ग़ज़ल
हसन शाहनवाज़ ज़ैदी
ग़ज़ल
ख़ुदा पे जब से बुरा वक़्त आ गया 'क़ैसर'
हुबल के लब पे है नग़्मा मनात रक़्स में है
क़ैसर सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
अगर होना पड़े मन्नत-कश-ए-अम्वाज भी मुझ को
तू फिर मेरी ख़ुदी को कुछ ग़म-ए-साहिल नहीं होता