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ग़ज़ल
ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से
चारा-साज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़
वरुन आनन्द
ग़ज़ल
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
तीर आया था जिधर से ये मिरे शहर के लोग
कितने सादा हैं कि मरहम भी वहीं देखते हैं
अमजद इस्लाम अमजद
ग़ज़ल
फ़लक देता है जिन को 'ऐश उन को ग़म भी होते हैं
जहाँ बजते हैं नक़्क़ारे वहीं मातम भी होते हैं
दाग़ देहलवी
ग़ज़ल
मोहब्बत करने वाले भी अजब ख़ुद्दार होते हैं
जिगर पर ज़ख़्म लेंगे ज़ख़्म पर मरहम नहीं लेंगे