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ग़ज़ल
शकील बदायूनी
ग़ज़ल
मर्कज़-ए-दीदा-ए-ख़ुबान-ए-जहाँ हैं भी तो क्या
एक निस्बत भी तो रखते हैं तिरी ज़ात से हम
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
अपने मरकज़ की तरफ़ माइल-ए-परवाज़ था हुस्न
भूलता ही नहीं आलम तिरी अंगड़ाई का
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
ग़ज़ल
तुम्हें दिल में जगह दी थी नज़र से दूर क्या करते
जो मरकज़ में ठहर जाए मज़ाफ़ाती नहीं होता
अफ़ज़ल ख़ान
ग़ज़ल
मरकज़-ए-शहर में रहने पे मुसिर थी ख़िल्क़त
और मैं वाबस्ता तिरे दिल के मज़ाफ़ात से था