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ग़ज़ल
लगता है फ़लक हम को अगर मिस्रा-ए-ऊला
तो फिर ये ज़मीं मिस्रा-ए-सानी है कि क्या है
सय्यद यासिर गीलानी
ग़ज़ल
ख़ुद मुझे तो बनना है मिस्रा-ए-ऊला शे'र में
तुम को उस का मिस्रा-ए-सानी बनाना है मुझे
अंकित मौर्या
ग़ज़ल
क्यों दरिया भर मिस्रा-ए-ऊला उस की मय्यत पर था रोया
जिस शाइ'र का दम निकला था मिस्रा-ए-सानी करते करते
हेमा काण्डपाल हिया
ग़ज़ल
सुलगना अंदर अंदर मिस्रा-ए-तर सोचते रहना
बदन पर डाल कर ज़ख़्मों की चादर सोचते रहना
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
फ़िक्र पहुँचती नहीं मिस्रा-ए-सानी कहूँ
हक़ ने तेरे क़द के तईं मिस्रा-ए-आली किया