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ग़ज़ल
इतनी मुद्दत बा'द मिले हो कुछ तो दिल का हाल कहो
कैसे बीते हम बिन प्यारे इतने माह-ओ-साल कहो
सय्यद शकील दस्नवी
ग़ज़ल
दिखाई दी है झलक उस की एक मुद्दत बा'द
ये ख़्वाब मेरे लिए ख़्वाब से ज़ियादा है
बासिर सुल्तान काज़मी
ग़ज़ल
फ़रियादों ने और बढ़ा दी मुद्दत बद-उनवानी की
बाज़ू फैलाने से शायद बंधन टूटें जाल खुले
मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
ग़ज़ल
मुद्दत बा'द समझ आया कि धुँदलाया क्यूँ इक मंज़र
हर रौशन सूरज को आख़िर इक दिन तो है ढल जाना
अबूज़र फ़ातमी
ग़ज़ल
किताबों से यक़ीनन जी 'हिया' अब भर गया होगा
वो मुद्दत बाद लौटा है मिरा दर खटखटाने को