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ग़ज़ल
'मुसव्विर' लोग कुछ बाहर के अंदर जम के बैठे हैं
जिन्हें अंदर ही रहना था वो बस बाहर निकल आए
रहमान मुसव्विर
ग़ज़ल
'मुसव्विर' कुछ न कहने का ये दुख भी सख़्त ज़ालिम है
तलब कर लेगी लफ़्ज़ों की अदालत देखते रहना
मुसव्विर सब्ज़वारी
ग़ज़ल
हसरतें रोती रहें दिल में मुजाविर की तरह
दिल मगर चुप ही रहा लौह-ए-मक़ाबिर की तरह
मुसव्विर सब्ज़वारी
ग़ज़ल
'मुसव्विर' आ के न ठहरा कोई भी ख़्वाबों में
उदास रातों की आँखों में रंग भर जाते
मुसव्विर सब्ज़वारी
ग़ज़ल
हिज्र की आग में बढ़ती है 'मुसव्विर' तब-ओ-ताब
ज़हर-ए-तन्हाई से रंग और सुनहरा होगा
मुसव्विर सब्ज़वारी
ग़ज़ल
ज़हर बन कर वो 'मुसव्विर' मिरी नस नस में रहा
मैं ने समझा था उसे भूल चुका हूँ मैं तो
मुसव्विर सब्ज़वारी
ग़ज़ल
नज़र आता 'मुसव्विर' ये भी रुख़ तस्वीर-ए-गुलशन का
नुमायाँ इस में कुछ रंग-ए-ख़िज़ाँ रखते तो अच्छा था
मुसव्विर करंजवी
ग़ज़ल
रंग ओ रोग़न से 'मुसव्विर' कुछ ग़रज़ रखते नहीं
खींच लेते हैं शबीह-ए-नाज़ ख़ून-ए-दिल से हम
मुसव्विर करंजवी
ग़ज़ल
ये भी 'मुसव्विर' उस के मशाम-ए-वफ़ा का रंग
मुझ को जो ज़ख़्म-ज़ख़्म बदन की क़बा मिली