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ग़ज़ल
अब कहीं कोई ठिकाना ही नहीं जुज़ कू-ए-यार
मुर्तद-ए-काअबा हुआ मर्दूद-ए-बुत-ख़ाना हुआ
हातिम अली मेहर
ग़ज़ल
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
ख़ुदा का दोस्त है तामीर-ए-दिल जो शख़्स करता हो
ख़लीलुल्लाह भी काबा का इक मेमार था क्या था
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
रफ़ू किया किए चाक-ए-वफ़ा-ओ-तार-ए-क़बा
वो रूठते रहे और हम उन्हें मनाए गए
राम अवतार गुप्ता मुज़्तर
ग़ज़ल
खुलेगा ख़ुद वो किसी रोज़ मिस्ल-ए-बंद-ए-क़बा
न छुप सकेगा लहू में रचाव जैसा है
ग़ौस मोहम्मद ग़ौसी
ग़ज़ल
ख़ुशामद जी हुज़ूरी ख़ुद-फ़रेबी से चमन वालो
रफ़ू करते रहोगे चाक-ए-दामान-ए-क़बा कब तक
नफीस अहमद सहर
ग़ज़ल
नसब सरकार ने जिस को किया ख़ुद अपने हाथों से
वक़ार-ए-अज़्मत-ए-काबा वो पत्थर याद आता है
सय्यद ज़फ़र काशीपुरी
ग़ज़ल
नमाज़-ए-अहल-ए-उलफ़त बे-नियाज़-ए-दैर-ओ-काअबा है
गवाही दी जहाँ दिल ने वहीं हम ने जबीं रख दी
सिराज लखनवी
ग़ज़ल
जुब्बा-फ़रसा-ए-दर-ए-का'बा थे कल तक तो 'ज़हीर'
गिरते पड़ते हुए आज आते हैं मयख़ाने से
ज़हीर देहलवी
ग़ज़ल
तन फ़र्त-ए-लताफ़त से हो जब रूह-ए-मुजस्सम
क्या ज़ोर चले कश्मकश-ए-बंद-ए-क़बा का
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
ग़ज़ल
ये बज़्म-ए-दैर-ओ-काबा है नहीं कुछ सेहन-ए-मय-ख़ाना
ज़रा आवाज़ गूँजी और पहचानी नहीं जाती
आनंद नारायण मुल्ला
ग़ज़ल
तिरी जुस्तुजू के सदक़े ये खुला है राज़ मुझ पर
कि म्यान-ए-दैर-ओ-का'बा कोई फ़ासला नहीं है