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ग़ज़ल
रिया-कारियों से मुसल्लह ये लश्कर मुझे मार देंगे
मैं बच भी गया तो नए हमला-आवर मुझे मार देंगे
हसन अब्बास रज़ा
ग़ज़ल
थे मुसल्लह ग़म-ए-माशूक़ से गो हम 'अख़्तर'
फिर भी दिखलाए ग़म-ए-दहर ने दम-ख़म क्या क्या
अख़्तर अंसारी
ग़ज़ल
यूँ तो मिज़्गाँ के कटारों से मुसल्लह थे सभी
माह-वश उन में कोई दस्त-ब-शमशीर भी था
हाशिम अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
'अदू की फ़ौज सफ़-बस्ता मुसल्लह भी मुनज़्ज़म भी
मगर हम हैं अभी ग़र्क़-ए-ख़याल-ए-रज़्म-आराई
अब्दुल्लाह ख़ालिद
ग़ज़ल
का'बे में मुसलमान को कह देते हैं काफ़िर
बुत-ख़ाने में काफ़िर को भी काफ़िर नहीं कहते
बिस्मिल सईदी
ग़ज़ल
हर धड़कन हैजानी थी हर ख़ामोशी तूफ़ानी थी
फिर भी मोहब्बत सिर्फ़ मुसलसल मिलने की आसानी थी
जौन एलिया
ग़ज़ल
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
ये मेरे इश्क़ की मजबूरियाँ मआज़-अल्लाह
तुम्हारा राज़ तुम्हीं से छुपा रहा हूँ मैं
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
मुसलमाँ के लहू में है सलीक़ा दिल-नवाज़ी का
मुरव्वत हुस्न-ए-आलम-गीर है मर्दान-ए-ग़ाज़ी का
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
उम्र सारी तो कटी इश्क़-ए-बुताँ में 'मोमिन'
आख़िरी वक़्त में क्या ख़ाक मुसलमाँ होंगे