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ग़ज़ल
मटन और दाल की क़ीमत बराबर हो गई जब से
यक़ीं आया कि दोनों में ''हरारे'' एक जैसे हैं
सरफ़राज़ शाहिद
ग़ज़ल
मुझे होटल भी ख़ुश आता है और ठाकुर दुवारा भी
तबर्रुक है मिरे नज़दीक प्रशाद और मटन दोनों
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
लाला-ए-गुल ने हमारी ख़ाक पर डाला है शोर
क्या क़यामत है मुओं को भी सताती है बहार
मज़हर मिर्ज़ा जान-ए-जानाँ
ग़ज़ल
बिकता हूँ ज़र-ए-मेहर हो बाज़ार-ए-वफ़ा में
इन मूलों गिराँ नें हों ख़रीदार के नज़दीक