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ग़ज़ल
दर्द-ए-हयात-ए-इश्क़ है नग़्मा-ए-जाँ-गुदाज़ में
ग़र्क़ है सारी काएनात लज़्ज़त-ए-सोज़-ओ-साज़ में
राम कृष्ण मुज़्तर
ग़ज़ल
नसीम आई बहार आई पयाम-ए-जाँ-फ़िज़ा लाई
'ख़याली' ज़िंदगी अब ज़िंदगी मा'लूम होती है
मोहम्मद नईमुल्लाह ख़्याली
ग़ज़ल
अजब अंदाज़ से आई है कुछ अठखेलियाँ करती
शमीम-ए-जाँ-फ़िज़ा के पास कुछ पैग़ाम है शायद
राज कुमार सूरी नदीम
ग़ज़ल
इलाही क्या मिरे दिलबर ने खोला अपने गेसू को
मशाम-ए-जाँ में अपने आ के बू-ए-जाँ-फ़िज़ा ठहरी
जमीला ख़ुदा बख़्श
ग़ज़ल
नवेद-ए-जाँ-फ़िज़ा है क्या ख़बर क़ातिल के आने की
बताओ तो सही तुम 'दाग़' ऐसे शादमाँ क्यूँ हो
दाग़ देहलवी
ग़ज़ल
मुज़्तर ख़ैराबादी
ग़ज़ल
यूँ तो बजते हैं कई साज़ तख़य्युल में मिरे
दिल मगर नग़्मा-ए-जाँ सुन के बहल जाता है
फ़रीदा आलम फ़हमी
ग़ज़ल
जितनी थी खटक साँस की कुल नग़्मा-ए-जाँ थी
क्या तुम ने मुझे हँस के पुकारा तो नहीं था
कैफ़ी चिरय्याकोटी
ग़ज़ल
नग़्मा-ए-जाँ सुनने वालो ये तकल्लुफ़ ता-ब-कै
ढा के ये दीवार भी देखो कि घर में कौन है
तौसीफ़ तबस्सुम
ग़ज़ल
नग़्मा-ए-जाँ सुनने वालो ये तकल्लुफ़ ता-ब-कै
ढा के ये दीवार भी देखो कि घर में कौन है
तौसीफ़ तबस्सुम
ग़ज़ल
ज़र्रे ज़र्रे की ज़बाँ पर नग़्मा-ए-जाँ-सोज़ है
दश्त-ज़ार-ए-ग़म ने ऐसी ख़ाक छनवाई कि बस