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ग़ज़ल
भूल कर हरगिज़ न लेते हम ज़बाँ से नाम-ए-इश्क़
गर नज़र आता हमें आग़ाज़ में अंजाम-ए-इश्क़
ज़हीर देहलवी
ग़ज़ल
इक जाम-ए-इश्क़ ने मुझे दीवाना कर दिया
का'बा भी मेरे वास्ते बुत-ख़ाना कर दिया
नामदासी माथुर ज़ीनत
ग़ज़ल
'फ़ज़ा' तुम उलझे रहे फ़िक्र ओ फ़लसफ़े में यहाँ
ब-नाम-ए-इश्क़ वहाँ क़ुरअ-ए-हुनर निकला