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ग़ज़ल
बाग़बानों को बताओ गुल-ओ-नस्रीं से कहो
इक ख़राब-ए-गुल-ओ-नसरीन-ए-बहार आ ही गया
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
आँख पड़ती है हर इक अहल-ए-नज़र की तुम पर
तुम में रूप ऐ गुल ओ नसरीन ओ समन किस का है
अल्ताफ़ हुसैन हाली
ग़ज़ल
क्या अंधा विश्वास था ऐ 'नसरीन' वो मुझ को मना लेगा
हर बंधन से छूट गया वो हाए क्यूँ उस से रूठी मैं
नसरीन नक़्क़ाश
ग़ज़ल
गुलशन-ए-हस्ती की रानाई तुम्हारे दम से है
नर्गिस-ओ-नसरीँ गुलाब-ओ-यासमन तुम ही तो हो
मोहम्मद शफ़ी सीतापूरी
ग़ज़ल
अश्क-ए-ख़ूनीं से जो सींचे थे बयाबाँ हम ने
उन में अब लाला ओ नस्रीं का नज़ारा भी तो हो
अली जवाद ज़ैदी
ग़ज़ल
परवेज़ शाहिदी
ग़ज़ल
नज़ाकत और लताफ़त वो कफ़-ए-पा तक कि हैराँ हूँ
समन गुल लाला नस्रीं नस्तरन दरपरनियाँ मख़मल
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
हुजूम-ए-लाला-ओ-नसरीं हो या लब-हा-ए-शीरीं हों
मिरी मौज-ए-नफ़स से ताज़ा-दम होते ही रहते हैं
अज़ीज़ हामिद मदनी
ग़ज़ल
महक उठती हैं जिस्म-ओ-जाँ की अफ़्सुर्दा फ़ज़ाएँ भी
जब आता है पिरो कर वो गुल-ए-नसरीन आँखों में