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ग़ज़ल
वो निगाह-ए-चश्म-ए-तिलिस्म-गर मुझे देखते ही लजा गई
वो अदा जो सहर-ए-तमाम से भी सिवा करिश्मा दिखा गई
नियाज़ हैदर
ग़ज़ल
दिल की चोरी में जो चश्म-ए-सुर्मा-सा पकड़ी गई
वो था चीन-ए-ज़ुल्फ़ में ये बे-ख़ता पकड़ी गई
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
ज़मीन-ए-चश्म-ए-नम में हम को तेरा ख़्वाब बोना था
तिरी हर याद का मोती तो पलकों में पिरोना था
लुबना सफ़दर
ग़ज़ल
राज़-ए-चश्म-ए-मय-गूँ है कैफ़-ए-मुद्दआ' मेरा
ग़ैर की नज़र से है दूर मै-कदा मेरा
अली मंज़ूर हैदराबादी
ग़ज़ल
वाह क्या फ़ैज़ान-ए-चश्म-ए-नर्गिस-ए-मस्ताना था
जिस तरफ़ नज़रें उठीं मय-ख़ाना ही मय-ख़ाना था
मोहम्मद मूसा
ग़ज़ल
वो है हैरत-फ़ज़ा-ए-चश्म-ए-मा'नी सब नज़ारों में
तड़प बिजली में उस की इज़्तिराब उस का सितारों में
अब्दुल मजीद सालिक
ग़ज़ल
है मेरे सामने तस्वीर-ए-चश्म-ए-यार हनूज़
मैं पी रहा हूँ मय-ए-हुस्न बार बार हनूज़
एस. नूरुद्दीन अनवर भोपाली
ग़ज़ल
ज़हर-ए-चश्म-ए-साक़ी में कुछ अजीब मस्ती है
ग़र्क़ कुफ़्र ओ ईमाँ हैं दौर-ए-मय-परस्ती है