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ग़ज़ल
न छेड़ ऐ निकहत-ए-बाद-ए-बहारी राह लग अपनी
तुझे अटखेलियाँ सूझी हैं हम बे-ज़ार बैठे हैं
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
ग़ज़ल
रिश्ता-ए-रंग-ए-जाँ मिरा निकहत-ए-नाज़ से तिरी
पुख़्ता हुआ और इस क़दर या'नी कि ख़ाम हो गया
जौन एलिया
ग़ज़ल
शाम-ए-ग़म कुछ उस निगाह-ए-नाज़ की बातें करो
बे-ख़ुदी बढ़ती चली है राज़ की बातें करो
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
मिज़ाज-ए-अहल-ए-दिल बे-कैफ़-ओ-मस्ती रह नहीं सकता
कि जैसे निकहत-ए-गुल से परेशानी नहीं जाती