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ग़ज़ल
जब अयाँ सुब्ह को वो नूर-ए-मुजस्सम हो जाए
गौहर-ए-शबनम-ए-गुल नय्यर-ए-आज़म हो जाए
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
ग़ज़ल
गुज़र जब जब हुआ है 'नूर' बाज़ार-ए-मोहब्बत से
बचा कर अपनी आँखें हम हर इक ख़ातून से निकले
शहनवाज़ नूर
ग़ज़ल
ख़ा ली शिकस्त फ़त्ह-ए-मुबीं के यक़ीन से
हाँ 'नूर' अब के हिम्मत-ए-मर्दां लिए हुए
नूर मोहम्मद नूर
ग़ज़ल
रस्म-ए-उल्फ़त में यही होता है अक्सर ऐ 'नूर'
डूब जाते हैं सफ़ीने तो ख़बर होती है