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ग़ज़ल
हँसते चेहरों से दिलों के ज़ख़्म पहचानेगा कौन
तुझ से बढ़ कर ज़ुल्म अपनी ख़ंदा-पेशानी करे
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
कौन पहचानेगा 'ज़र्रीं' मुझ को इतनी भीड़ में
मेरे चेहरे से वो अपनी हर निशानी ले गया
इफ़्फ़त ज़र्रीं
ग़ज़ल
हम सौदागर अश्क-ए-वफ़ा के कौन हमें पहचानेगा
कौन हक़ीक़त को समझेगा अफ़्सानों की महफ़िल में
माया खन्ना राजे बरेलवी
ग़ज़ल
हुस्न पहचानेगी मेरा देखने वाली नज़र
ख़ूँ तो है आँखों में चेहरे पर अगर ग़ाज़ा नहीं
मुज़फ़्फ़र वारसी
ग़ज़ल
पर्दे से निकलते नहीं और कहते हैं मुझ से
पहचानोगे क्या हम को ख़ुदा को नहीं देखा
अब्दुल ग़फ़ूर नस्साख़
ग़ज़ल
अव्वल तो नहीं पहचानोगे और लोगे भी पहचान तो फिर
हर तौर से छुप कर देखेंगे और दिल को ख़ुश कर जाएँगे हम