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ग़ज़ल
इक दिन जब बूढे पेंटर के पास शराब के पैसे नहीं थे
छत पर ये घनघोर घटा तब से इस पब का हिस्सा है
इदरीस बाबर
ग़ज़ल
हर रंग में हैं पाते बंदे ख़ुदा के रोज़ी
है पेंटर तो फिर क्या रंगरेज़ है तो फिर क्या
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
सिगरेट मुँह में उल्टी रख कर फिल्टर को सुलगाता है
'पागल' तू है पूरा पगला ये मालूम न वो मालूम
पागल आदिलाबादी
ग़ज़ल
ज़ुल्फ़ खोले हुए रोते हैं वो पाईन-ए-मज़ार
जज़्ब-ए-उल्फ़त ने बड़ा काम किया मेरे बा'द
मोहम्मद यूसुफ़ रासिख़
ग़ज़ल
अदब की पैंतरे-बाज़ी से दिल उक्ता गया 'पारस'
तअ'ल्लुक़ मुंक़ता' कर लूँ अना आवाज़ देती है
तिलक राज पारस
ग़ज़ल
मुहिउद्दीन गुल्फ़ाम
ग़ज़ल
घर के गुल-दानों में 'शाहिद' फूल होंगे काग़ज़ी
और पर्दों पर प्रिंटेड तितलियाँ रह जाएँगी
सरफ़राज़ शाहिद
ग़ज़ल
किए मुझ पे वार तू ने कई पैंतरे बदल के
कि यहाँ से तू भी रहना मिरे वार से सँभल के