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ग़ज़ल
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
मोहब्बतों की परख का यही तो रस्ता है
तिरी तलाश में निकलूँ तुझे न पाऊँ मैं
इफ़्तिख़ार इमाम सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
जाँच-परख कर देख चुकी तू हर मुँह-बोले भाई को
कहने दे अब कोई सच्ची बात 'क़तील-शिफ़ाई' को
क़तील शिफ़ाई
ग़ज़ल
आँख में हो परख तो देख हुस्न से पुर है कुल जहाँ
तेरी नज़र का है क़ुसूर जल्वों की कुछ कमी नहीं
असर रामपुरी
ग़ज़ल
'आरज़ू' अब भी खोटे खरे को कर के अलग ही रख देंगी
उन की परख का क्या कहना है जो टेकसाली आँखें हैं
आरज़ू लखनवी
ग़ज़ल
करता हूँ मैं दुज़्दीदा-नज़र गर कभी उस पर
नज़रों में परख ले है नज़र-बाज़ तो देखो