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ग़ज़ल
जन्नत में ख़ाक बादा-परस्तों का दिल लगे
नक़्शे नज़र में सोहबत पीर-ए-मुग़ाँ के हैं
चकबस्त बृज नारायण
ग़ज़ल
धुएँ से आग के इक अब्र-ए-दरिया-बार हो पैदा
'असद' हैदर-परस्तों से अगर होवे दो-चार आतिश
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
ज़िंदा हैं मुर्दा-परस्तों में अभी तक 'ग़ालिब'
मगर उस्ताद 'यगाना' सा अब उस्ताद नहीं
यगाना चंगेज़ी
ग़ज़ल
ख़ुशी कैसी ख़ुशी से वास्ता क्या ग़म परस्तों को
मुसलसल ग़म न हो तो ज़िंदगी दुश्वार हो जाए
सईद शहीदी
ग़ज़ल
मय-परस्तों में है यूँ साग़र-ओ-मीना का वक़ार
जैसे इस्लाम में हो मोहतसिब ओ सद्र की क़द्र
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
अमल सें मय-परस्तों के तुझे क्या काम ऐ वाइ'ज़
शराब-ए-शौक़ का तू ने पिया नीं जाम ऐ वाइ'ज़