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ग़ज़ल
पर्बत पर्बत घूम चुका हूँ सहरा सहरा छान रहा हूँ
हर मंज़िल के हक़ में लेकिन काफ़िर का ईमान रहा हूँ
क़तील शिफ़ाई
ग़ज़ल
बस्ती बस्ती पर्बत पर्बत वहशत की है धूप 'ज़िया'
चारों जानिब वीरानी है दिल का इक वीराना क्या
अहमद ज़िया
ग़ज़ल
देखते देखते दुनिया बदली गुलशन क्या वीराना क्या
पर्बत पर्बत नक़्श थे जिन के मिटते मिटते ख़ाक हुए
अख़्तर अंसारी
ग़ज़ल
तुम तो ख़ुद भी शीशा निकले तुम से क्या उम्मीद करें
हम समझे थे पर्बत पर्बत तुम पत्थर पिघलाओगे
सय्यद मोहम्मद अहमद नक़वी
ग़ज़ल
किस से किस का साथी छूटा किस का 'उमर' क्या हाल हुआ
पर्बत पर्बत वादी वादी रात मचा था शोर बहुत
उमर अंसारी
ग़ज़ल
हम से पहले भी इस जग में पीत हुई है मन टूटे हैं
जाने कितने फ़रहादों के पर्बत पर्बत सर फूटे हैं
तुफ़ैल दारा
ग़ज़ल
सहरा सहरा जंगल जंगल पर्बत पर्बत बे-ख़ौफ़ फिरे
लेकिन इस नादाँ दिन ने भला खाई भी तो मात समुंदर पर
सुहैल आज़ाद
ग़ज़ल
बादल जब ऊँचे पर्बत पर धुंद की चादर तान गए
क्या क्या बरसेगा मिट्टी पर सारे साए जान गए