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ग़ज़ल
अजब दस्तूर है अबरार इस दुनिया-ए-बे-पर का
शिकस्ता-रंग पत्तों पर फ़िदा शबनम नहीं होती
ख़ालिद अबरार
ग़ज़ल
ताइर-ए-बे-पर बचे क्या दाम से सय्याद के
ज़द में जब सारी फ़ज़ा-ए-गुल्सिताँ तक आ गई
मुस्लिम मलेगाँवी
ग़ज़ल
नावक-ए-बे-पर अगर है उस की मिज़गान-ए-दराज़
क़ौस क्यों समझे न आशिक़ अबरू-ए-ख़मदार को
मोहम्मद इब्राहीम आजिज़
ग़ज़ल
ब-ज़ाहिर उस के लबों पर हँसी रही लेकिन
दम-ए-विदाअ' वो दर-पर्दा बे-क़रार भी था
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
पर किए हैं जो अता ताक़त-ए-परवाज़ भी दे
या तो मैं खुल के उड़ूँ या मुझे बे-पर कर दे
ज़फर इबन-ए-मतीन
ग़ज़ल
मकीं कितने हैं बे-दीवार-ओ-दर के इन ज़मीनों पर
नहीं है सर पे गर साया तो क्या है आसमाँ बाक़ी