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ग़ज़ल
अव्वल-ए-शब वो बज़्म की रौनक़ शम्अ' भी थी परवाना भी
रात के आख़िर होते होते ख़त्म था ये अफ़्साना भी
आरज़ू लखनवी
ग़ज़ल
शिकवा हर दम ही तअ'स्सुब का न 'परवाना' करो
तुम हो क़ाबिल तो मिले कुछ भी न मंज़िल के सिवा
एजाज़ परवाना
ग़ज़ल
इश्क़ हूँ तो शम-ए-हुस्न-ए-यार का परवाना हूँ
हुस्न हूँ तो मैं चराग़-ए-का'बा-ओ-बुत-ख़ाना हूँ
बिस्मिल सईदी
ग़ज़ल
जल गया परवाना गर तो क्या ख़ता है शम्अ' की
रात भर जलना जलाना उस की क़िस्मत है तो है
दीप्ति मिश्रा
ग़ज़ल
कौन सी वो शम्अ' थी जिस का मैं परवाना हुआ
और फिर लौ भी लगी ऐसी कि दीवाना हुआ