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ग़ज़ल
पस-ए-पर्दा तुझे हर बज़्म में शामिल समझते हैं
कोई महफ़िल हो हम उस को तिरी महफ़िल समझते हैं
ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मज्ज़ूब
ग़ज़ल
तजल्ली-ए-पस-ए-पर्दा ज़रा तवक़्क़ुफ़ कर
अभी तो गर्म-ए-नज़र बज़्म-ए-मुम्किनात में हूँ
सिराज लखनवी
ग़ज़ल
आँखों वालों ने देख लिया उस ज़ात-ए-पस-ए-पर्दा को मगर
उस का अदना सा जल्वा भी अंधों के लिए नायाब रहा