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ग़ज़ल
वो संग-दिल हुआ है इक संग-दिल पे आशिक़
आता है जी में सर को पथरों से फोड़ डालूँ
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
पीले पत्तों को सह-पहर की वहशत पुर्सा देती थी
आँगन में इक औंधे घड़े पर बस इक कव्वा ज़िंदा था