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ग़ज़ल
पेश-ए-ज़ालिम जुरअत-ए-इज़हार-ए-हक़ होती नहीं
ज़ाहिरन रखने को बस मुँह में ज़बाँ रखते हैं हम
इबराहीम नूरी
ग़ज़ल
जाने किस मोड़ पे क्या हादिसा पेश आ जाए
मुस्तक़िल जेब में हम अपना पता रखते हैं
शान-ए-हैदर बेबाक अमरोहवी
ग़ज़ल
पेश करता है छुपा कर ग़म-ए-पिन्हाँ लेकिन
उस की तहरीर का हर ज़ेर-ओ-ज़बर चीख़ता है
बद्र-ए-आलम ख़ाँ आज़मी
ग़ज़ल
बता ज़ालिम मिरे क़ासिद ने तेरा क्या बिगाड़ा था
जो ले कर फाड़ डाला दस्त-ए-बे-तक़्सीर से काग़ज़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
अपना मिट्टी का पियाला हम को प्यारा है बहुत
हम न देंगे पेश अगर वो साग़र-ए-जम भी करें
शकील इबन-ए-शरफ़
ग़ज़ल
कोई आज़ुर्दा करता है सजन अपने को हे ज़ालिम
कि दौलत-ख़्वाह अपना 'मज़हर' अपना 'जान-ए-जाँ' अपना
मज़हर मिर्ज़ा जान-ए-जानाँ
ग़ज़ल
मैं क़फ़स में हूँ क़फ़स पेश-ए-निगाह-ए-सय्याद
पर-ए-पर्वाज़ में जुम्बिश का गुमाँ होता है
उरूज ज़ैदी बदायूनी
ग़ज़ल
गरचे पेश-ए-ताक़-ए-अबरू-ए-सनम गेसू नहीं
का'बा पर नर्ग़ा हुआ है लश्कर-ए-कुफ़्फ़ार का