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ग़ज़ल
अन-पढ़ आँधी घुस पड़ती है तोड़ के फाटक महलों के
''अंदर आना मनअ है'' लिख कर लटकाने से हासिल क्या
परवेज़ शाहिदी
ग़ज़ल
वो जो इंसान के ही बस में है उस पर इंसाँ
जाने किस मुँह से शिकायात-ए-फ़लक करते हैं
मन्नान बिजनोरी
ग़ज़ल
तवाफ़ करती हवा का रोना मताफ़ में ग़ुल मचा रहा था
हरम के फाटक से बैन करती कोई सवारी निकल रही थी
अहमद जहाँगीर
ग़ज़ल
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
दस्त-ए-फ़लक में गर्दिश-ए-तक़दीर तो नहीं
दस्त-ए-फ़लक में गर्दिश-ए-अय्याम ही तो है