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ग़ज़ल
क़तील शिफ़ाई
ग़ज़ल
मिल गए थे एक बार उस के जो मेरे लब से लब
उम्र भर होंटों पे अपने मैं ज़बाँ फेरा किया
जुरअत क़लंदर बख़्श
ग़ज़ल
का'बा सुनते हैं कि घर है बड़े दाता का 'रियाज़'
ज़िंदगी है तो फ़क़ीरों का भी फेरा होगा