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ग़ज़ल
कश्कोल-ए-चश्म ले के फिरो तुम न दर-ब-दर
'मंज़ूर' क़हत-ए-जिंस-ए-वफ़ा का ये साल है
मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद
ग़ज़ल
ऐश-ओ-इशरत करो हर वक़्त तुम 'इंशा-अल्लाह'
हुस्न चमकाए फिरो सब में परी-ज़ाद रहो
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
ग़ज़ल
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
ग़ज़ल
सुन के शिकवा हश्र में कहते हो शरमाते नहीं
तुम सितम करते फिरो दुनिया पे शरमाने को हम
क़मर जलालवी
ग़ज़ल
जो पहले थे हम वो आज भी हैं पहचान हमारी आसाँ है
तुम रूप बदल कर लाख फिरो पर किस किस को झुटलाओगे
मुशफ़िक़ ख़्वाजा
ग़ज़ल
ये दुनिया है यहाँ हर आबगीना टूट जाता है
कहीं छुपते फिरो आख़िर ज़माना ढूँढ ही लेगा