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ग़ज़ल
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
वार सब पीठ पे करते हैं यूँ दिल में रह कर
तू बता दे मैं दुआ दूँ तो दुआ दूँ किस को
अमित शर्मा मीत
ग़ज़ल
अब भी बुज़ुर्गों की बातें सुन कर अच्छा तो लगता है
पर इन गिरती दीवारों से अपनी पीठ लगाए कौन
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
ग़ज़ल
लगा जो पीठ में आ कर वो तीर था किस का
मैं दुश्मनों की सफ़ों में न मरने वाला था
राजेन्द्र मनचंदा बानी
ग़ज़ल
ऐ अजल दी तू ने बार-ए-जिस्म से आ कर नजात
कब से मेरी पीठ पर ये ख़ाक का पुश्तारा था