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ग़ज़ल
देखो इंसाँ ख़ाक का पुतला बना क्या चीज़ है
बोलता है इस में क्या वो बोलता क्या चीज़ है
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
वो भी कोई हम ही सा मासूम गुनाहों का पुतला था
नाहक़ उस से लड़ बैठे थे अब मिल जाए मनाएँगे
बशर नवाज़
ग़ज़ल
नूह नारवी
ग़ज़ल
भारत भूषण पन्त
ग़ज़ल
आदम ख़ता का पुतला है गर मान लें ये बात
निकलेंगी इस ख़राबी से कितनी ख़राबियाँ
बासिर सुल्तान काज़मी
ग़ज़ल
दुनिया में कोई मुझ सा गुनहगार न होगा
मैं ख़ाक का पुतला नहीं पुतला हूँ ख़ता का