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ग़ज़ल
सब कुछ झूट है लेकिन फिर भी बिल्कुल सच्चा लगता है
जान-बूझ कर धोका खाना कितना अच्छा लगता है
दीप्ति मिश्रा
ग़ज़ल
उड़ चला वो इक जुदा ख़ाका लिए सर में अकेला
सुब्ह का पहला परिंदा आसमाँ भर में अकेला
राजेन्द्र मनचंदा बानी
ग़ज़ल
दिन आता था और सीने में शाम का ख़ाका बनता था
शाम आती थी और जिस्मों में शाम भी आख़िर ढलती थी
हम्माद नियाज़ी
ग़ज़ल
अब तुम सोचो अब तुम जानो जो चाहो अब रंग भरो
हम ने तो इक नक़्शा खींचा इक ख़ाका तय्यार किया