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ग़ज़ल
ग़म-ए-आशिक़ी से कह दो रह-ए-आम तक न पहुँचे
मुझे ख़ौफ़ है ये तोहमत तिरे नाम तक न पहुँचे
शकील बदायूनी
ग़ज़ल
हम कहाँ और कहाँ रस्म-ओ-रह-ए-'आम-ए-ग़ज़ल
जाने किस शोख़ के सर जाएगा इल्ज़ाम-ए-ग़ज़ल
अब्दुर रऊफ़ उरूज
ग़ज़ल
ख़ैर गुज़री रह-ए-हस्ती में हैं 'लाग़र' तन्हा
लोग कहते हैं कि रहबर भी दग़ा देते हैं
ओम प्रकाश लाग़र
ग़ज़ल
बुलबुल न बाज़ आइयो फ़रियाद-ओ-आह से
कब तक न होगी क़ल्ब-ए-गुल-ए-तर को इत्तिलाअ
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
दिल में तीर-ए-इश्क़ है और फ़र्क़ पर शमशीर-ए-इश्क़
क्या बताएँ पड़ गई है पाँव में ज़ंजीर-ए-इश्क़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
बहुत ही साफ़-ओ-शफ़्फ़ाफ़ आ गया तक़दीर से काग़ज़
तुम्हारे वास्ते लाया हूँ मैं कश्मीर से काग़ज़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
पोशाक न तू पहनियो ऐ सर्व-ए-रवाँ सुर्ख़
हो जाए न परतव से तिरे कौन-ओ-मकाँ सुर्ख़