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ग़ज़ल
रह-रव-ए-राह-ए-मोहब्बत कौन सी मंज़िल में है
दिल है बे-ज़ार-ए-मोहब्बत और मोहब्बत दिल में है
बिस्मिल सईदी
ग़ज़ल
तय है अब राह-ए-मोहब्बत से गुज़रना मेरा
फिर उसी राह में ख़ुशबू सा बिखरना मेरा
अमीता परसुराम मीता
ग़ज़ल
कभी थे हम-सफ़र राह-ए-मोहब्बत में ख़ुदा और हम
ख़ुदा अब आसमाँ पर है ज़मीं पर हैं हवा और हम
फ़रहत एहसास
ग़ज़ल
मिली है राह-ए-मोहब्बत में ए'तिबार की छाँव
सुलगते सहरा में है साथ तेरे प्यार की छाँव