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ग़ज़ल
उठी मौज-ए-सबा जुम्बाँ से शाख़-ए-आशियाँ पैहम
चली जाती है गोया कश्ती-ए-बुलबुल समुंदर में
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
सादुल्लाह शाह
ग़ज़ल
नज़र तुम ने चुरा ली तुम किसी सूरत नहीं मिलते
इसी से इब्तिदा-ए-दर्द-ए-पैहम होती जाती है
राजेश कुमार औज
ग़ज़ल
अगले लुक़्मों में नहीं क़ंद-ए-मुकर्रर का मज़ा
सख़्त बे-लुत्फ़-ए-हयात-ए-पैहम है हम को
दत्तात्रिया कैफ़ी
ग़ज़ल
तुझ को क्यूँ रंजिश-ए-बेजा है अदू का खटका
मैं उठाऊँगा मोहब्बत में ये इल्ज़ाम कि तू
मुज़्तर ख़ैराबादी
ग़ज़ल
बशर ने ही नहीं समझे रुमूज़-ए-गर्दिश-ए-पैहम
रुमूज़-ए-गर्दिश-ए-पैहम मह-ओ-अख़्तर समझते हैं
कुलदीप गौहर
ग़ज़ल
तबीअत ही बदल दी लज़्ज़त-ए-आज़ार-ए-पैहम ने
वो चाहें भी तो मेरे ग़म का दरमाँ हो नहीं सकता
अफ़क़र मोहानी
ग़ज़ल
इस से कुछ ख़ौफ़ नहीं इस से है अंदेशा-ए-मर्ग
रंजिश-ए-ख़ल्क़ जुदा रंजिश-ए-दिलदार जुदा
शाह अकबर दानापुरी
ग़ज़ल
ये शौक़ की वारदात-ए-पैहम ये वादा-ए-इल्तिफ़ात-ए-पैहम
कहाँ कहाँ आज़मा चुके हैं कहाँ कहाँ आज़मा रहे हैं