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ग़ज़ल
रक़ीबाँ की न कुछ तक़्सीर साबित है न ख़ूबाँ की
मुझे नाहक़ सताता है ये इश्क़-ए-बद-गुमाँ अपना
मज़हर मिर्ज़ा जान-ए-जानाँ
ग़ज़ल
शेर आशिक़ आज के दिन क्यूँ रक़ीबाँ पे न हों
यार पाया है बग़ल में ख़ाना-ए-ख़ुरशीद है
आबरू शाह मुबारक
ग़ज़ल
किस ज़ुल्फ़ को सुलझाएँ रक़ीबान-ए-सियह-कार
छूता नहीं इस ज़ुल्फ़ को फिर शाना हमारा
शाद अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
नहीं मा'लूम था ग़ाैल-ए-रक़ीबाँ साथ चलता है
न कोई हाल पूछेगा न ग़म-ख़्वारी कभी होगी
किश्वर नाहीद
ग़ज़ल
वही कि रश्क-ए-रक़ीबाँ से तीरा-तर है जो ज़ुल्फ़
कल इत्तिफ़ाक़ से उस की हिकायतें निकलीं
अज़ीज़ हामिद मदनी
ग़ज़ल
हर इक की बात सुनने पर तवज्जोह मत कर ऐ ज़ालिम
रक़ीबाँ उस सीं होवेंगे जुदा आहिस्ता आहिस्ता
वली दकनी
ग़ज़ल
शिकस्त इस को कहूँ या फ़त्ह-मंदी कह के ख़ुश हो लूँ
कि अल्ताफ़-ए-रक़ीबाँ से भी बहरा-वर रहा हूँ मैं