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ग़ज़ल
इक तमाशा देखता हूँ रस्म-ए-उल्फ़त के ख़िलाफ़
आँख है दिल की मुख़ालिफ़ दिल नसीहत के ख़िलाफ़
बिशन दयाल शाद देहलवी
ग़ज़ल
बिछड़ना रस्म-ए-उल्फ़त है करिश्मा हो नहीं सकता
तू मेरी हो नहीं सकती मैं तेरा हो नहीं सकता
उमर आलम
ग़ज़ल
रस्म-ए-उल्फ़त से है मक़्सूद-ए-वफ़ा हो कि न हो
ज़ख़्म-ए-दिल और हो ख़ून-बस्ता-ए-शिफ़ा हो कि न हो
इरफ़ान अहमद मीर
ग़ज़ल
तमन्ना ग़ैर की करना ख़िलाफ़-ए-रस्म-ए-उल्फ़त है
मैं एहसान-ए-अजल क्यूँ लूँ नहीं हैं क्या सितम तेरे
नसीम देहलवी
ग़ज़ल
वफ़ा का ज़िक्र ख़ुद करना ख़िलाफ़-ए-रस्म-ए-उल्फ़त है
सुबुक हो कर न पेश-ए-दोस्त बार-ए-ग़म-गराँ करना
अब्बास अली ख़ान बेखुद
ग़ज़ल
रस्म-ए-उल्फ़त को निभाने के लिए मैं अक्सर
ख़ुद को ना-कर्दा गुनाहों की सज़ा देती हूँ
अस्मा रियाज़ अस्मा
ग़ज़ल
तिरे हर झूठ को सच मान लेते हैं हमेशा हम
हमें भी रस्म-ए-उल्फ़त को निभाना ख़ूब आता है
चाँदनी पांडे
ग़ज़ल
सच कहूँ 'आमिर' कि अब उस दौर में जीते हो तुम
रस्म-ए-उल्फ़त भी जहाँ सूद ओ ज़ियाँ होने लगी
मुहम्मद याक़ूब आमिर
ग़ज़ल
निभाया तुम ने हर नाता वफ़ा का बेवफ़ाई से
हमारा रस्म-ए-उल्फ़त भी निभाना देखते जाओ
भगवान खिलनानी साक़ी
ग़ज़ल
निबाहेगा ज़माने से वो कैसे रस्म-ए-उल्फ़त को
जो अपनी कज-अदाई से हमें बेज़ार करता है