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ग़ज़ल
सावन में तो ख़ुद-सोज़ी भी हो जाती है नाकाम
रेला सा गुज़र जाता है सब 'अज़्म बुझा कर
हसन अब्बास रज़ा
ग़ज़ल
तमाशा-गाह-ए-दुनिया में बताऊँ क्या उम्मीदों की
तन-ए-तन्हा था मैं ऐ 'शाद' और रेलों पे रेला था
शाद अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
कभी अपनों की यूरिश थी कभी ग़ैरों का रेला था
तिरे मिलने की ख़ातिर हम ने क्या क्या दुख न झेला था
हमीद जालंधरी
ग़ज़ल
इधर से पानियों का रेला कब का जा चुका है
मगर बच्चे दरख़्तों से अभी चिमटे हुए हैं
अख़्तर होशियारपुरी
ग़ज़ल
बीच में हाइल कर दे कोई काश तकल्लुफ़ की दीवार
उधर है रेला गुल-चीनों का और गुलों में काल इधर