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ग़ज़ल
'रिशी' क़ानून-ए-क़ुदरत है अमल-दारी तग़य्युर की
मक़ाम-ए-इंतिहा पर इब्तिदा की बात होती है
ऋषि पटियालवी
ग़ज़ल
सलीक़ा आते आते आया है नज़रों से पीने का
'रिशी' अब मय-कशी बे-गाना-ए-जाम-ओ-सुबू होगी
ऋषि पटियालवी
ग़ज़ल
ख़्वाबों में मसरूफ़ है तू पर मेरी ये बेदारी देख
मेरी रातों की स्याही में रंग-ए-ख़ूँ को तारी देख