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ग़ज़ल
मुझ को इन कलियों की रंगत और अदा से क्या मतलब
भंवरो की फूलों से सिर्फ़ हवस की रिश्तेदारी है
यायावर दीवाना
ग़ज़ल
नज़दीकी अक्सर दूरी का कारन भी बन जाती है
सोच-समझ कर घुलना-मिलना अपने रिश्ते-दारों में
आलोक श्रीवास्तव
ग़ज़ल
कहा क्या उस के रिश्ता-दार भी मिलने नहीं आते
जवाब आया ये सहरा रात-दिन सुनसान रहता है
ऐतबार साजिद
ग़ज़ल
सब के ग़मों में थोड़ी थोड़ी मैं ने हिस्से-दारी की
ख़ुशियों की उम्मीद न रक्खी दर्द से रिश्ता-दारी की
नसीम निकहत
ग़ज़ल
बड़ा इल्ज़ाम ठहरा है तअल्लुक़ रिश्ता-दारी का
क़राबत की मोहब्बत बद-गुमानी होती जाती है