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ग़ज़ल
रूप को धोका समझो नज़र का या फिर माया-जाल कहो
प्रीत को दिल का रोग समझ लो या जी का जंजाल कहो
सय्यद शकील दस्नवी
ग़ज़ल
ऐतबार साजिद
ग़ज़ल
दिल ले के दग़ा देते हैं इक रोग लगा देते हैं
हँस-हँस के जला देते हैं ये हुस्न के परवाने को
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
दिल-लगी दिल की लगी बन के मिटा देती है
रोग दुश्मन को भी या-रब न लगाना दिल का