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ग़ज़ल
जहाँ थे मुत्तफ़िक़ सब अपने बेगाने डुबोने को
उसी साहिल पे आज अपनी अना की सीपियाँ रोलें
ख़ालिद शरीफ़
ग़ज़ल
हर दम फ़िक्र के मोती रोलें पर दो मीठे बोल न बोलें
भेद यहाँ के किस पे खोलें दुनिया ही कंगाल हुई है