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ग़ज़ल
देखो मुझे देखा न करो नीची नज़र से
क्यों करते हो रुस्वा मुझे बज़्म-ए-रुफ़क़ा में
महाराजा सर किशन परसाद शाद
ग़ज़ल
तीर पहलू में नहीं ऐ रुफ़क़ा-ए-पर्वाज़
ताइर-ए-जान के ये पर हैं बराए पर्वाज़
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
ग़ज़ल
मुहम्मद राशिद अतहर
ग़ज़ल
'न'ईम' इस वास्ते भी अब ग़ज़ल कहना ज़रूरी है
कहीं रुफ़क़ा न कह दें वो जहाँ-दारी में रहता है
अब्दुस समी सिद्दीक़ी नईम
ग़ज़ल
उस दिन पहली बार हुआ था मुझ को रिफ़ाक़त का एहसास
जब उस के मल्बूस की ख़ुश्बू घर पहुँचाने आई है
जौन एलिया
ग़ज़ल
जब उस ने मुझ से ये कहा था इश्क़ रिफ़ाक़त ही तो नहीं
तब मैं ने हर शख़्स की सूरत मुश्किल से पहचानी थी