aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "saa.e"
सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस कीसुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं
अब के कुछ ऐसी सजी महफ़िल-ए-याराँ जानाँसर-ब-ज़ानू है कोई सर-ब-गरेबाँ जानाँ
सुनता था वो भी सब से पुरानी कहानियाँशायद रफ़ाक़तों की ज़रूरत उसे भी थी
इस के साए में मिरे ख़्वाब दहक उट्ठेंगेमेरे चेहरे पे चमकता हुआ आँचल कर दो
शाम के साए बालिश्तों से नापे हैंचाँद ने कितनी देर लगा दी आने में
वो मुसाफ़िर ही खुली धूप का थासाए फैला के शजर क्या करते
अपने साए से चौंक जाते हैंउम्र गुज़री है इस क़दर तन्हा
फूल गुल शम्स ओ क़मर सारे ही थेपर हमें इन में तुम्हीं भाए बहुत
इक शाम के साए तले बैठे रहे वो देर तकआँखों से की बातें बहुत मुँह से कहा कुछ भी नहीं
जाम में घोल कर हुस्न की मस्तियाँ चाँदनी मुस्कुराई मज़ा आ गयाचाँद के साए में ऐ मिरे साक़िया तू ने ऐसी पिलाई मज़ा आ गया
रस्ता भी कठिन धूप में शिद्दत भी बहुत थीसाए से मगर उस को मोहब्बत भी बहुत थी
वो पास क्या ज़रा सा मुस्कुरा के बैठ गयामैं इस मज़ाक़ को दिल से लगा के बैठ गया
अपने ही साए से हर गाम लरज़ जाता हूँरास्ते में कोई दीवार खड़ी हो जैसे
मैं अपने पाँव तले रौंदता हूँ साए कोबदन मिरा ही सही दोपहर न भाए मुझे
आज भी गाँव में कुछ कच्चे मकानों वालेघर में हम-साए के फ़ाक़ा नहीं होने देते
उम्र भर अपने गरेबाँ से उलझने वालेतू मुझे मेरे ही साए से डराता क्या है
अंदर का ज़हर चूम लिया धुल के आ गएकितने शरीफ़ लोग थे सब खुल के आ गए
अपने साए को इतना समझाने देमुझ तक मेरे हिस्से की धूप आने दे
देख कर अपने दर-ओ-बाम लरज़ जाता हूँमिरे हम-साए में जब भी कोई दीवार गिरे
कुछ भी था सच के तरफ़-दार हुआ करते थेतुम कभी साहब-ए-किरदार हुआ करते थे
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