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ग़ज़ल
सारे रिंद औबाश जहाँ के तुझ से सुजूद में रहते हैं
बाँके टेढ़े तिरछे तीखे सब का तुझ को इमाम किया
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
हम ने कब ये गुर सीखा हम ठहरे सीधे-सादे लोग
जिस की जैसी फ़ितरत देखें उस से वैसी बात करें
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
ग़ज़ल
मज़ाक़ उड़ाते हैं लोग फ़र्ज़ी कहानियों का
कि सीधे-सादे से उन बुज़ुर्गों का क्या बनेगा
जहाँज़ेब साहिर
ग़ज़ल
सूफ़ी ये सहव महव हुए सद्द-ए-बाब-ए-उंस
क्या इम्बिसात कार-गह-ए-हसत-ओ-बूद में
पंडित जवाहर नाथ साक़ी
ग़ज़ल
दुख में नीर बहा देते थे सुख में हँसने लगते थे
सीधे-सादे लोग थे लेकिन कितने अच्छे लगते थे
निदा फ़ाज़ली
ग़ज़ल
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
अहमद हुसैन माइल
ग़ज़ल
यार ने ख़त में जो लिक्खा है कि न आना हरगिज़
हो गया मेरे लिए सद्द-ए-सिकंदर काग़ज़