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ग़ज़ल
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
मुझे कुछ ऐसी आँखें चाहिएँ अपने रफ़ीक़ों में
जिन्हें बेबाक सच्चे आइनों से डर नहीं लगता
सलीम अहमद
ग़ज़ल
कोई सच्चे ख़्वाब दिखाता है पर जाने कौन दिखाता है
मुझे सारी रात जगाता है पर जाने कौन जगाता है
सलीम कौसर
ग़ज़ल
हम को सब मालूम है 'मोहसिन' हाल पस-ए-गिर्दाब है क्या
आँख ने सच्चे गुर सीखे हैं सूरज की दरबानी से
मोहसिन असरार
ग़ज़ल
लफ़्ज़ गूँगे हैं इन्हें गोयाई देने के लिए
ज़िंदगी के सच्चे लम्हों में ग़ज़ल कहता हूँ मैं
अतहर नफ़ीस
ग़ज़ल
'नासिर' मेरे मुँह की बातें यूँ तो सच्चे मोती हैं
लेकिन उन की बातें सुन कर भूल गए सब बातों को